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"जीवन जीने की कला"

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=> हर मनुष्य को अपना एक निश्चित लक्ष्य निर्धारित करना ही चाहिए, ताकि सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते उसे केवल अपने लक्ष्य की याद रहे और वह सही दिशा में अपना कदम बढ़ाता रहे ।

=> 'सब दिन होत न एक समाना', यानी जीवन में कभी सुख आता है, तो कभी दुख । कभी संयोग होता है, तो कभी वियोग । कभी अच्छे व्यक्ति मिलते हैं, तो कभी बुरे भी मिल जाते हैं । असली शूरवीर वही है, जो जीवन की विपरीत दशाओं में भी समभाव बनाए रखता है ।

=> प्राणी जगत में शायद मनुष्य जाति के पास ही सर्वोतम रूप में विकसित 'वाणी' है । वाणी का (शब्दों का) भारी प्रभाव सुनने वालों पर पड़ता है । जीवन में हर एक व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से भले-बुरे शब्द सुनने को मिल ही जाते हैं । यदि हम लोगों द्वारा कहे गए भले-बुरे शब्दों के प्रभाव में आ जाएँ तो, हम हम न रहकर (शब्दों द्वारा) नचाई गई कठपुतलीयों की भाँति बन जाएँगे । अतः बुद्धिमानी इसी में है कि हम भले-बुरे (निंदा-स्तुति वाले) शब्दों के प्रभाव में न आएं ।

=> सूर्य की किरणें बिखरी हुई रहती हैं, किंतु जब उन्हें घनिभूत कर दिया जाता है, तो अग्नि प्रज्जवलित हो उठती है । इसी तरह हमारी चेतना-शक्ति बिखरी होने पर उसकी शक्ति न के बराबर होती है । परंतु यदि उसे घनिभूत कर लिया जाए, तो न जाने क्या-क्या काम हम कर सकते हैं, जिन्हें दुनिया आश्चर्य से देखेगी ।

=> कर भला, तो हो भला । प्रकृति में ऐसी व्यवस्था है कि जब हम दूसरों का भला करते हैं, तो हमारा भला अपने आप हो जाता है । अतः हमें सदैव दूसरों की मदद जरूर करनी चाहिए ।


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